Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मार्णवे विलुलितं त्रिजगत्तरङ्गमुत्पादनाद्यभिभवेन विभिन्नरूपम् ।
आलीनमुन्नमितमाकुलदृश्यदृश्यमालोकयन्प्रकलयंश्च चिरं स्थितोऽस्मि ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, ब्रह्मरूपी
समुद्र में चलायमान, उत्पत्ति, वृद्धि, विपरिणाम और अपक्षयरूप अभिभावों से (एक दूसरे की टक्करों
से) प्राप्त हुए चित्र-विचित्र रूपों से युक्त पूर्वोक्त रीति से बार-बार आविर्भूत एवं विलीन हुए तथा
साक्षी द्वारा भासमान बुद्धि, मन एवं इन्द्रियों के विषयीभूत भ्रमणशील त्रिजगत्रूपी तरंगों को व्युत्थानकाल
में देखता हुआ और समाधि-काल में लय करता हुआ मैं चिरकाल स्थित हूँ