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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

असत्तां जगतः सत्तामात्मनः करबिल्ववत् । सुप्तः प्रबुद्धः पश्यामि तेनास्मि चिरजीवितः ॥ ३२ ॥ जीर्णं भिन्नं श्लथं क्षीणं क्षुब्धं क्षुण्णं क्षयं गतम् । पश्यामि नववत्सर्वं तेन जीवाम्यनामयः ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, निरन्तर समाधियुक्त मे अनेकविध आशारूपी पाशो से बद्ध हुई चित्तवृत्ति को अपने हृदय के अन्दर तनिक भी स्थान नहीं देता, इसलिए निर्विकार होकर मैं चिरंजीवी हूँ ३१॥ ब्रह्मन्‌, बाह्य पदार्थो के विषय मेँ सुप्त होकर मैं जगत की असत्ता देखता हूँ और अपने भीतर प्रबुद्ध होकर, हाथ में बेल की नाई, आत्मा की सत्ता देखता रहता हूँ, इसलिए चिरंजीवी हूँ