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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

घटश्चिच्चित्पटश्चित्खं चिद्वनं शकटं च चित् । चित्सर्वमिति मे भावस्तेन जीवाम्यनामयः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

क्या सर्वत्र स्थल में विद्यमान जडता को लेकर ही तुम अहंबुद्धि करते हो ? नहीं, ऐसा उत्तर देते हैं । घट चित्स्वरूप है, पट चित्स्वरूप है, आकाश चित्स्वरूप हे, अरण्य ओर शकट भी चित्स्वरूप हैं, चित्‌ ही सब कुछ है, इस प्रकार मेरी भावना है, इसलिए अनामय होकर चिरंजीवी हूँ