Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
नित्यानित्यासु लोलासु जगत्स्थितिषु सुस्थितः ।
अन्तर्मुखोऽस्मि तिष्ठामि स्वकामेनात्मनात्मनि ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
निरन्तर विनाशशील, अतिचंचल, इष्ट ओर अनिष्ट स्वरूप
इन जागतिक अवस्थाओं में मैं किसी प्रकार के विक्षेप के बिना ही दृढ़तापूर्वक स्थित रहता हूँ। मेरी वृत्ति
सदा अन्तर्मुख रहती है यानी मैं कभी तुच्छ बाह्य विषयों की स्पृहा नहीं करता । एकमात्र अपने स्वरूप से
अपनी आत्मा में ही स्वच्छन्दवृत्ति से स्थित रहता हूँ