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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 86

चौरासीवाँ सर्ग समाप्त प्रचासीवाँ सर्ग वीतहव्य मुनि की सूर्य के पिंगलनामक गण में प्रवेशकर अपनी देह की उद्धृति, जीवन्मुक्त स्थिति ओर अन्त समाधि का वर्णन ।

26 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामजी ने कहा : भगवन्‌, अब कृपापूर्वक मुझसे यह बतलाइए कि महामुनि वीतहव्य ने उस भूगर्भ…
  2. Verse 2वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर समाधि में उक्त मुनि ने अपनी वीतहव्य नामक मन को आत्मा का ए…
  3. Verse 3जब वह महादेवजी के गण थे, तब किसी समय चिदात्मा का ध्यान करते समय उनकी यह इच्छा हुई कि मेँ…
  4. Verse 4तदन्तर उन्होने कुछ नष्ट हुई और कुछ नष्ट न हुई अपनी समस्त देहो को प्रत्यक्ष देखा | देखने क…
  5. Verses 5–6वहाँ पर पृथ्वी के उदर-कोटर में पीडित उस वीतहव्य नामक शरीर को कीचड़ में स्थित कीड़े की नाई…
  6. Verse 7महान्‌ तेजस्वी वीतहव्य ने इस प्रकार धरा के विवर में पीड़ित अपनी देह को देखकर उत्तम बोध से…
  7. Verse 8सम्पूर्ण अवयवों मे पीडा होने के कारण प्राणवायु से यानी प्राण-संचारों से निर्मुक्त मेरी दे…
  8. Verse 9इसलिए उद्धार के उपाय को जानकर मैं परकीय शरीर में प्रवेश के लिए योग शास्त्र में उपदिष्ट मा…
  9. Verse 10उनकी दूसरी चिन्ता बतलाते हैं। अथवा इस प्रपंच से मेरा क्या प्रयोजन है ? मैं इस शरीर से निर…
  10. Verse 11हे महामते उस प्रकार मन से विचार कर महामुनि वीतहव्य क्षणभर भूतल में चुपचाप बैठकर फिर विचार…
  11. Verse 12मुझे देह का त्याग न तो उपादेय (अपेक्षणीय ) है और न देह का आश्रय ही उपादेय है, क्योकि जैसे…
  12. Verse 13इसलिए जब तक यह शरीर है और जब तक वह अणु परमाणु रूप नहीं बन जाता, तब तक मैं इसका आश्रय कर क…
  13. Verse 14उद्धार करने के लिए आकाश में स्थित सूर्य के शरीर में मैं उस प्रकार प्रवेश करता हूँ, जिस प्…
  14. Verse 15उस प्रकार विचार कर वायुरूपधारी यानी सूक्ष्म स्वरूप मुनि वीतहव्य ने पूर्व में व्याख्यात पु…
  15. Verses 16–17उदार बुद्धिवाले भगवान्‌ मननशील सूर्य ने भी हृदय में प्रविष्ट उक्त मुनिनायक को देखा ओर उनक…
  16. Verse 18उसके बाद सूर्य ने क्या किया ? उसे कहते हैं। आकाश के मध्य में संचरण करनेवाले सूर्य भगवान्‌…
  17. Verse 19सूर्य के हृदय में प्रविष्ट हुई मुनि वीतहव्य की संवित्‌ ने क्या किया ? उसे कहते हैं । मुनि…
  18. Verse 20सूर्य के द्वारा अत्यन्त मानपूर्वक आज्ञा को प्राप्त हुए उक्त वीतहव्य मुनि ने विन्ध्याद्रि…
  19. Verse 21सूर्य भगवान्‌ के गण पिंगल ने आकाश का परित्याग कर लतागृह ओर कुंजर से सुन्दर तथा वर्षाकाल म…
  20. Verse 22जिसने अपने नखों से भूतल को खोद दिया है, ऐसे पिंगल ने भूगर्भ से मुनि वीतहव्य के कलेवर को उ…
  21. Verse 23तदनन्तर मुनि वीतहव्य-सम्बन्धी पुर्यष्टक शरीर पिंगल के शरीर से निकलकर अपने शरीर मेँ उस प्र…
  22. Verse 24प्राप्त मूर्ति वीतहव्य तथा आकाशगामी पिंगल दोनों ने परस्पर प्रणाम किया | तदनन्तर तेज के नि…
  23. Verse 25पिंगल आकाश की ओर चले गये ओर मुनि वीतहव्य निर्मल सरोवर की ओर, जो कुमुदरूपी ताराओं से युक्त…
  24. Verse 26विकसित कमलो से युक्त उस सरोवर में मुनि वीतहव्य ने तुरंत उस प्रकार मज्जन किया, जिस प्रकार…
  25. Verse 27उसमें स्नानकर तदनन्तर जपकर ओर उसके वाद सूर्य की पूजाकर मनन आदि व्यवहारो से युक्त शरीर से…
  26. Verses 28–60पूर्वोक्त समान शीलो में मत्री, एकरूप सर्वातिशायीशान्ति, सुन्दर प्रज्ञा, मुदित कृपा तथा उत…