Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 86, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 86, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
दिनान्ते स समाधातुं पुनरेव मनो मुनिः ।
विवेश कांचिद्विततां विज्ञातां विन्ध्यकन्दराम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी ने कहा : भगवन्, अब कृपापूर्वक मुझसे यह बतलाइए कि महामुनि वीतहव्य ने उस
भूगर्भ में स्थित अपनी देह का कैसे उद्धार किया ? उसका प्रकार क्या था ? उसके बाद उनकी दिनचर्या
क्या रही और देहमुक्ति में अवशिष्ट उनका स्वरूप कैसे था २
सर्ग सन्दर्भ
चौरासीवाँ सर्ग समाप्त प्रचासीवाँ सर्ग वीतहव्य मुनि की सूर्य के पिंगलनामक गण में प्रवेशकर अपनी देह की उद्धृति, जीवन्मुक्त स्थिति ओर अन्त समाधि का वर्णन ।