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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 86, Verses 5–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 86, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

उदितोऽस्तं गत इव स्वस्तं गत इवोदितः । समः समरसाभासस्तिष्ठामि स्वच्छतां गतः ॥ ५ ॥ प्रबुद्धोऽपि सुषुप्तस्थः सुषुप्तस्थः प्रबुद्धवत् । तुर्यमालम्ब्य कायान्तस्तिष्ठामि स्तम्भितस्थितिः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर पृथ्वी के उदर-कोटर में पीडित उस वीतहव्य नामक शरीर को कीचड़ में स्थित कीड़े की नाई देखा । वह वर्षा के प्रवाह से कुछ दूर बहाया गया था, उसके पृष्ठभाग पर कीचड़ का स्तर जम गया था ओर उनके त्वचा, हाथ आदि अवयव तथा पीठस्थ मिट्टी ये सब काश आदि घासो के समूहों से व्याप्त हो गये थे । 'पीठस्थ' शब्द से यह सूचित होता है कि वे जलप्रवाहों से उलटे मुँह गिराये गये थे