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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 86, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 86, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 86 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

वयमात्मेति यैषा वो बभूव किल वासना । तत्त्वविस्मृतिजाता हि दृष्टरज्जुभुजङ्गवत् ॥ १६ ॥ अनात्मन्यात्मता सैषा सैषा वस्तुन्यवस्तुता । अविचारेण वै जाता विचारेण क्षयं गता ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

उदार बुद्धिवाले भगवान्‌ मननशील सूर्य ने भी हृदय में प्रविष्ट उक्त मुनिनायक को देखा ओर उनके कार्य को तथा पूर्वापर शरीरों को देखा। तदनन्तर विन्ध्यपर्वत के भूगर्भ के अर्न्तगत तृण और पत्थर से चारों ओर ढके हुए तथा मृतप्राय मुनि वीतहव्य के शरीर को देखा