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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 79

सतहत्तरवाँ सर्ग समाप्त अठहत्तरवाों सर्गं चित्त के स्पन्दन से होनेवाली जगत्‌ की भ्रान्ति, चित्तस्पन्दन के स्वरूप और उसके निरोध में हेतुभूत योग का भली प्रकार वर्णन ।

52 verse-groups

  1. Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जैसे रात्रि में जलती हुई लकड़ी को गोल घुमाने से अस…
  2. Verse 2हे श्रीरामजी, जैसे जल के परितः स्पन्दन से (भ्रमण से) जल के पृथक्‌ वर्तुल (गोल) नामि आकार…
  3. Verse 3जैसे आकाश में सूर्यताप के संमुखनेत्रो के परिस्पन्दन से यानी ईक्षण से असत्‌ पिच्छाकार (मोर…
  4. Verse 4श्रीरामजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, जिस स्वभाव विशेष से चित्तप्रस्पन्दित होता है और जिस उपाय…
  5. Verses 5–6चित्त के स्यन्दनस्वभाव को चित्त से अलग नहीं कर सकते, इसलिए दृष्टान्तो के ही द्वारा उसका द…
  6. Verse 7अभेदांश ही कल्पित क्यो नहीं है ? इस आशंका का परिहार कर रहे महाराज वक्तिष्ठजी येन न स्पन्द…
  7. Verse 8अतएव स्यन्द के निरोध के द्वारा दोनो का नाश करने के लिए ज्ञानरूप उपाय शास्त्र में दिखलाया…
  8. Verse 9उन दो में से पहले प्रथम उपाय की जिज्ञासा कर रहे श्रीरामजी पूछते हैं। श्रीरामजी ने कहा : ह…
  9. Verse 10इस सर्ग की समाप्तिपर्यन्त इसी प्रश्न के उत्तर का वर्णन करनेवाले महाराज वस्िष्ठ चित्तस्पन्…
  10. Verse 11यदि शंका हो कि प्राण वायु तो बाहर ही जाता है, हृदय मेँ तो अन्य अपान आदि वायु संचरण करते ह…
  11. Verse 12जैसे आमोद का (सौगन्ध्य का) पुष्प तथा जैसे शुक्लत्व का हिम आश्रय हे, वैसे ही चित्त का यह प…
  12. Verse 13(वारिद्ष्टान्त की उपपत्ति के लिए रस" यह विशेषण दिया गया है । श्रुति भी कहती है : (आपोमयः…
  13. Verse 14प्राण के स्पन्दन से चित्त का स्पन्दन होता है यानी चिदाभास से व्याप्त वृत्तिविशेष, उत्पन्न…
  14. Verse 15चित्त का परिस्पद प्राण परिस्पन्द के अधीन है, यह बात बड़े-बड़े महर्षि, जो “प्राणबन्धनं हि…
  15. Verse 16भले ही ऐसा हो, उससे प्रकृत में क्या हुआ, इस पर कहते हैँ । मन के स्पन्दन की विश्रान्ति हो…
  16. Verse 17श्रीरामजी ने कहा: महाराज, देहरूपी अपने घर में स्थित हृदयादि स्थानों मे विद्यमान बहत्तर हज…
  17. Verse 18प्राणवायु की चचलता के निरोध में निरालम्बन ओर सालम्बन आदि राजयोगरूपी उपायों का उपदेश देने…
  18. Verse 19सबसे पहले स्थूल शिखर में, चन्द्रबिम्ब में, मणि, देवता की मूर्ति आदि स्थलों में अथवा जहाँ…
  19. Verse 20अथवा पूरक, कुम्भक और रेचक के क्रम से प्राणवायु का निरोध करके दुदान्ति मन का निरोध करना चा…
  20. Verse 21उच्चस्वर से प्रणव का उच्चारण होने पर प्रान्त में (अन्त्य में) जो शेष तुर्यमात्रा रूप शब्द…
  21. Verse 22अब रेचक और पूरक इन दो में से किसी एक के द्वारा श्वास और प्रश्वास का जब शिथिलीकरण हो जाता…
  22. Verse 23पूरक का दृढ़ अभ्यास होने पर, पर्वत के ऊपर मेघों की नाई, शरीर के आभ्यन्तर विद्यमान हजारों…
  23. Verse 24पूर्ति के अनन्तर पूर्ण कुम्भ की नाईं कुम्भक के अनन्त काल तक स्थित होने पर और अभ्यास से प्…
  24. Verse 25जिह्नामूल के ऊपरी हिस्से में विद्यमान मुखान्तर्गत जो दो भाग है, उन्हें तालू कहते हैँ । उन…
  25. Verse 26समस्त विकारों से वर्जित अतएव किसी भी नाम से शून्य सूक्ष्म आकाश में यानी हृदयाकाश में बाह्…
  26. Verse 27नासिका के अग्रभाग से उपलक्षित बारह अंगुलमात्र से परिमित बाह्य आकाश में चक्षु और मन का निर…
  27. Verse 28लम्बिकायोग से असमुच्चित अन्य उपायों से भी अभ्यस्त पूर्वोक्त नभोधारणा योग से प्राण स्पन्दन…
  28. Verse 29इसी प्रकार खेचरी मुद्रा भी प्राण स्पन्दन के निरोध में हेतु है, यह कहते हैं। चिरकाल तक निर…
  29. Verse 30गुरु या ईश्वर के अनुग्रह से काकतालीय न्याय से झटिति ज्ञान के उद्बुद्ध हो जाने पर तत्क्षण…
  30. Verse 31(“अथ यदिदमस्मिन्त्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः“) (उत्तम, मध्यम अधि…
  31. Verse 32श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, इस जगत्‌ में प्राणियों का वह हृदय क्या है ? महाआदर्शस…
  32. Verse 33वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इस जगत्‌ मे प्राणियों के दो प्रकार के हृदय हे - एक उपादेय ओर दूसर…
  33. Verses 34–35मासखण्डरूप हृदय ओर मनरूप हृदय परिच्छिन्न होने के कारण उन दोनों को एक मानकर दो विभाग यहाँ…
  34. Verse 36संवित्‌-मात्रस्वरूप से स्थित हृदय तो उपादेय कहा गया है। (यदि शंका हो कि आत्मा के लिए जो ह…
  35. Verses 37–38हे श्रीरामजी, संवित्‌ ही सभी प्राणियों का हृदय कहा जाता है, न कि जड़ ओर जीर्णं पत्थर के स…
  36. Verse 39इसलिए संवित्‌-स्वरूप विशुद्ध हृदय में वासनाओं से वर्जित होकर बलपूर्वक चित्त को लगाने से प…
  37. Verse 40सहसा हठयोग मेँ प्रवृत्ति का निरास करने के लिए कहते हैँ । ये जो पूर्वोक्त योगात्मक युक्तिय…
  38. Verse 41वैराग्यरूपी लांछन से समन्तात्‌ लांछित यानी संसारासक्ति से वर्जित तथा अभ्यास से दृढता को प…
  39. Verse 42अतएव तत्‌-तत्‌ सिद्धिरूप फलभेद के लिए पातंजल शास्त्र में भ्रूमध्य आदि स्थानभेद से धारणाओं…
  40. Verse 43“जिह्या55क्रम्य घण्टिकाम्‌” यह जो पहले कहा गया था, उसमें उपाय कहते हैं। पुनः-पुनः चिरकालि…
  41. Verse 44ये जो समाधिभेद बतलाये गये हैं, उनका तत्‌-तत्‌ सिद्धि-फलों में विकल्पों का बाहुल्य होने पर…
  42. Verse 45हे श्रीरामचन्द्रजी , अभ्यास से ही पुरुष आत्मा में रमण करनेवाला, वीतशोक, भीतरी सुख से पूर्…
  43. Verse 46श्रीरामजी, अभ्यास के द्वारा प्राणवायुओं का जब चांचल्य विनष्ट हो जाता है तब मन विश्रान्ति…
  44. Verse 47हे श्रीरामजी, वासना से युक्त मन शरीर को ग्रहण करता है, तदनन्तर उसमें अभिमान से प्राण का ग…
  45. Verse 48चूँकि प्राणवायु का स्पन्दन मन का स्वरूप है और उससे संसाररूपी भ्रम उत्पन्न होता है, इसलिए…
  46. Verse 49हे श्रीरामजी, प्राणी का विकल्पांश विनष्ट हो जाने पर केवल वह पद (ब्रह्मपद) अवशिष्ट रह जाता…
  47. Verse 50न उसके स्वरूपभूत ही जगत्‌ है । वास्तव में दृश्यमान इस प्रकार का जगत्‌ है ही नहीं
  48. Verse 51यहाँ पर वसिष्ठजी इदं दृश्यं यत्र न“ इस वाक्य से आधेयतारूप से, “यतो न“ इससे उपादेयतारूप “य…
  49. Verse 52यदि शंका हो कि इस जगत्‌ में ब्रह्म का कोई भी सदश दष्टान्त नहीं है, तो उसका परिचय कैसे होग…
  50. Verse 53फलमत उपपत्तेः“ (इष्ट, अनिष्ट आदि कर्मो का फल इश्वर से प्राप्त होता है क्योकि इसी अर्थ में…
  51. Verse 54उसका परिचय होने पर पुरुषार्थ सिद्धि को बतला रहे महाराज वसिष्ठ प्रकृत विषय का उपसंहार करते…
  52. Verse 55हे श्रीरामजी, जिस महात्मा की समस्त कामोपभोग की इच्छाएँ निवृत्त हो गई हैं, जिसकी कामोपभोग…