Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 42
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अतएव तत्-तत् सिद्धिरूप फलभेद के लिए पातंजल शास्त्र में भ्रूमध्य आदि स्थानभेद से धारणाओं
के भेद बतलाये गये हैं, इस आशय से कहते हैं।
हे श्रीरामजी, जैसे पर्वत का झरना दूर जाकर वहीं पर लीन हो जाता है, वैसे ही भरू, नासिका,
तालू-संस्थान तथा कण्ठाग्र प्रदेश से लेकर बारह अंगुलिपरिमित प्रदेश में अभ्यासवश से प्राण लीन हो
जाता है । पतंजलि ने कहा भी है- नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्", “कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः',
"कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्', “मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्" (नाभिचक्र में प्राण का संयम करने से कायव्यूह का
कायस्थ वातादि पदार्थ का परिज्ञान होता है, कण्ठ के नीचे कूपप्रदेश में प्राण के संयम से क्षुधा ओर
पिपासा की निवृत्ति हो जाती है, कूप के नीचे वक्षःस्थल में कूर्माकार नाड़ी होती है, उस कूर्मनाड़ी में
प्राण का संयम करने से स्थिरपद प्राप्त हो जाता है, कपालमध्य प्रभास्वर मूर्धज्योति में संयम करने से
स्वर्ग और पृथ्वी के अन्तरालवर्ती सिद्धो का दर्शन होता है)