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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि इस जगत्‌ में ब्रह्म का कोई भी सदश दष्टान्त नहीं है, तो उसका परिचय कैसे होगा ? तो इस पर कहते हैँ । नित्य उदित स्वरूप यह चितिरूपी चन्द्रिका समस्त शालियों का (अन्नो का) आस्वाद देखनेवाली, सूर्यादि समस्त तेजो की दीपिका (प्रकाशिका) ओर आभ्यन्तर समस्त कामों की कल्पनात्मिका हे । निष्कर्ष यह निकला कि रूप, रस आदि को विषय करनेवाली बाह्य वृत्तियों की त्रिपुटी की तथा आभ्यन्तर कामादि वृत्तियों की त्रिपुटी की भासक होने से इस चितिरूपी चन्द्र का परिचय करना चाहिए