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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मेदं बृंहिताकारं वृहद्बृहदवस्थितम् । ज्ञानादस्तमितद्वित्वं भवात्मैव त्वमात्मना ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि प्राण वायु तो बाहर ही जाता है, हृदय मेँ तो अन्य अपान आदि वायु संचरण करते हैं ? तो इस पर कहते है। हे श्रीरामजी, स्पन्दनवश से भीतर क्रिया के वैचित्र्य को प्राप्त हुए उसी प्राणवायु के अपान आदि नामों की विद्वानों ने कल्पना की है, अत: अपान आदि प्राण के ही वृत्तिभेद है, उससे अन्य नहीं है, यह भाव है