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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

संवित्तिरेव संवेद्यं नानयोर्द्वित्वकल्पना । चिनोत्यात्मानमात्मैव रामैवं नान्यदस्ति हि ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

अभेदांश ही कल्पित क्यो नहीं है ? इस आशंका का परिहार कर रहे महाराज वक्तिष्ठजी येन न स्पन्दते तथा“ (जिस उपाय से मन वैसे स्पन्दित नहीं होता) इस प्रश्नांश का उत्तर देते है । चित्त और चित्त-परिस्पन्द इन दो पक्षों मे से एक पक्ष का संशय होने पर जो स्वयं गुण ओर गुणी इस रूप से कारणात्मा विकल्पित है, उस रूप से स्थित होकर ही दोनों गुण-गुणी नष्ट हो जाते हैं, इस विषय में संशय नहीं करना चाहिए, तात्पर्य यह है कि जो गुण ओर गुणी शब्द से स्वयं कारण कल्पा गया है, उसी कारण के स्वरूप से स्थित होकर ही गुण ओर गुणी दोनों विकल्पों का भी विनाश मानना चाहिए, न कि निरन्वय विनाश मानना चाहिए । ऐसी स्थिति में केवल कारणस्वरूप से स्थिति पाकर ही गुण ओर गुणी के भेद का विनाश अनुभूत होने से भेदांश ही कल्पित है, अभेदांश नहीं, यह सिद्ध होता है ओर मन एवं मन स्पन्द इन दोनों मे से एकतरफे विनाश के अधीन आत्यान्तिक उभय निवृत्ति से ही स्पन्दन का निवारण नहीं किया जा सकता, यह भी सिद्ध होता है