Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
आदावन्ते च संशान्तं स्वरूपमविनाशि यत् ।
वस्तु नामात्मनश्चैव तन्मयो भव राघव ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
(वारिद्ष्टान्त की उपपत्ति के लिए रस" यह विशेषण दिया गया है । श्रुति भी कहती है : (आपोमयः
प्राणः एतमेवांगिरसं मन्यन्ते प्राणो वा अगानां रसः (प्राण जलमय है और प्राण को ही अंगिरस मानते
हैं, क्योंकि वह (प्राण) अगो का रस है । कोश की नाई चारो ओर संश्लिष्ट होने से चित्त के साथ मानों
अभिन्नता को प्राप्तहुआ प्राण चित्त का आश्रय होता है । श्रुति भी कहती है : श्राणवन्धनं हि सोम्यमन:
(हि सौम्य, मन प्राण के आधीन है) ।
इसीलिए प्राणस्यन्द चित्तस्पन्द का हेतु है, ऐसा कहते है ।
हे श्रीरामजी, भीतर प्राण के परिस्पन्दन से संकल्प के (वृत्तिमात्र के) आकलन में उन्मुख जो
संवित् उत्पन्न होती है, वही चित्त कहलाती है, यह आप जानिये