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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

जगदात्मैव सकलमविद्या नास्ति कुत्रचित् । इति दृष्टिमवष्टभ्य सम्यग्रूपः स्थिरो भव ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

सबसे पहले स्थूल शिखर में, चन्द्रबिम्ब में, मणि, देवता की मूर्ति आदि स्थलों में अथवा जहाँ कहीं भी मन रमण करता हो, वहीं पर चित्त का निरोध करने के लिए अभ्यास करना चाहिए, ऐसा कहते हैं। चिरकालपर्यन्त एकाग्ररूप से (एक-प्रकार-स्वरूप से) उत्पन्न यानी एकाग्र रूप परिणाम को प्राप्त कर उदित हुए अभिवांछित ध्यान से (जहाँ कहीं भी सरसवाहिनी इच्छा हुई, उसी पदार्थ के ध्यान से) जो एक वस्तु के स्वरूप का निरन्तर पुनः-पुनः अनुसन्धान होता है, उसी अनुसन्धान से प्राण का स्पन्दन (प्राणवायु का चांचल्य) निरुद्ध हो जाता है