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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 59

अद्जावनवाँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग एकान्त में बाह्य ओर आभ्यन्तर दृश्यों का परित्याग कर रहे राजा सुरघु को विचार से स्वात्मलाभ हुआ, यह कथन ।

33 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, पूर्वोक्त प्रकार से इस सुरघु राजा को उपदेश देकर भगवान…
  2. Verse 2तत्त्वद्रष्टा उक्त मुनि के चले जाने पर उस राजा ने एकान्त ओर अनिन्दित स्थान में जाकर बुद्ध…
  3. Verses 3–7राजा पहले बाह्य दृश्यों में आत्मता और आत्मीयता का विचार से निरास करते हैं। मैं न मेरु पर्…
  4. Verse 8एवं सेवकों, सेनाओं, वाहनों और अन्य नगरों से युक्त राज्य मैं नहीं हूँ और मेरा राज्य नहीं ह…
  5. Verse 9केवल कल्पना के त्यागरूप उपाय से बाह्य विषयों के साथ अपने सम्बन्ध का निरास कर अव अचेतन होन…
  6. Verse 10इस शरीर में विद्यमान मांस ओर अस्थि मेँ नहीं हूँ, क्योकि वे अचेतन है, मेरे सम्बन्ध को भी व…
  7. Verse 11मांस जड़ है, अतः मांस मैं नहीं ह, (रक्त जड़ है, अतः) वह भी मद्रूप होने में समर्थ नहीं है।…
  8. Verse 12देह में जो कुछ जड पदार्थ है वह मैं नहीं हूँ, क्योकि मैं चेतन हूँ
  9. Verse 13भोग मैं नहीं हूँ और भोग मेरे नहीं है, मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं हैं और जड़ एवं असत्‌ स्वर…
  10. Verse 14संसाररूपी दोष का मूल कारण मन मैं नहीं हूँ, क्योंकि वह अचेतन है । अनन्तर अब दृष्टात्मक (जा…
  11. Verse 15जिसका स्वरूप अति चपल है, ऐसा शरीर से लेकर मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि तक जो स्थूल-सूक्ष्म भू…
  12. Verse 16अब बाकी तो प्रमाता जीव है, वह विषयों के साथ जब प्रकाशता है, तब “मेँ इसे जानता हूँ यों त्र…
  13. Verse 17इसी युक्ति से साक्षिसंवेद्य प्रमिति और प्रमेयको छोड़ता हूँ, क्योकि चेत्य नहीं हूँ, यह निश…
  14. Verse 18हार कहीं खो यया“ इस भ्रम से यत्र तत्र खोज रहे पुरुष को अपने गले मे ही उत्ते दिख जाने पर ह…
  15. Verse 19अपने अनुभव के साथ (एप ब्रह्मैष इन्द्रः“ (यह ब्रह्मा है, यह इन्द्र है) इत्यादि श्रुतियों क…
  16. Verse 20उस प्रकार की यह चितिशक्ति समस्त मलों से परे हैं, विषयों के आमय से (बीमारी से) वर्जित है,…
  17. Verse 21यह चितिशक्ति समस्त मानसिक वृत्तियों में निवास करती है, (क्योंकि “प्रतिबोधविदितं मतम्‌” या…
  18. Verse 22यह चिति निरतिशयानन्दरूप सर्व सौन्दर्य से परिपूर्ण है , समस्त प्रकाश- योग्य पदार्थों को प्…
  19. Verse 23यह चिति शक्ति सम्पूर्ण आकार और विकारों से युक्त है, समस्त विकारों से रहित है तथा सब भूतों…
  20. Verse 24यही चिति शक्ति चौदह भुवनों के भेद से चौदह प्रकार के भूतों के संगो को उनके अन्दर धारण करती…
  21. Verse 25सुख और दुःख की अवस्था का जो परिज्ञान होता है, वह तो केवल मिथ्या अवभास है और नाना प्रकार क…
  22. Verse 26यही चिति समस्त जगत्‌ में अनुगत मेरी आत्मा है, जो मेरी बुद्धि का साक्षी है, वह यही चिति है…
  23. Verse 27शरीररूपी रथ पर आरूढ हुआ मन इसी चितिशक्ति के प्रसाद से अनेक तरह के संसारों की लीलाओं में ज…
  24. Verse 28वास्तव में ये मन, शरीर आदि वस्तुएँ कुछ भी नहीं हैं। तुच्छ मन आदि के नष्ट हो जाने पर भी इस…
  25. Verse 29चित्तरूपी नटों द्वारा बनाया गया जगज्जालरूपी यह नाटक इसी एक साक्षी रूपी बुद्धि से, जो कि द…
  26. Verse 30अत्यन्त दुःख की बात है कि निग्रह और अनुग्रह की स्थिति में मुझे देहविषयिणी चिन्ता व्यर्थ ह…
  27. Verses 31–32अहो, अब तो मैं जाग गया हूँ, मेरा असद्विचार नष्ट हो गया, जो दृष्टव्य था, उसे समग्ररूप से म…
  28. Verse 33जगत्‌ में जो यह सब कुछ दृश्य दिखाई देता है, वह चिन्निष्पन्दांश मात्रांश से चित्‌ का निष्प…
  29. Verse 34आत्ममोह के निकल जाने पर सुख और दु:ख की प्राप्ति भी नहीं होती, ऐसा कहते हैं। क्या सुख है ?…
  30. Verse 35जिसका आनन्देकरस पूर्वस्वभाव से अनुभव होता है, ऐसा ब्रह्मरूप आलोक में क्या शोक है, क्या मो…
  31. Verse 36अलौकिक चमत्कार से परिपूर्ण यह चिदाकाश नाम की वस्तु सबका अतिक्रमण कर यानी सबसे परे अपना अस…
  32. Verse 37भाँति पूर्णरूप से मैंने जान लिया । सम्यक्‌ ज्ञान होने पर जिसका आविभव होता है अथवा जो सम्य…
  33. Verse 38राग, द्वेष आदि दोषों के निकल जाने के कारण मेरी जाग्रत्‌, स्वप्न और सुषुप्तिरूपी तीनों अवस…