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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा भगवानेनं सुरघुं रघुनन्दन । ययौ स्वमेव रुचिरं माण्डव्यो मौनमण्डलम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, पूर्वोक्त प्रकार से इस सुरघु राजा को उपदेश देकर भगवान्‌ माण्डव्य अपने सुन्दर मुनियों के रहने योग्य देश की ओर चले गये

सर्ग सन्दर्भ

अद्जावनवाँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग एकान्त में बाह्य ओर आभ्यन्तर दृश्यों का परित्याग कर रहे राजा सुरघु को विचार से स्वात्मलाभ हुआ, यह कथन ।