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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

चित्रमेषोऽस्मि लब्धात्मा जातः कालेन कार्यवान् । एष सोऽहमनन्तात्मा नान्तोऽस्य परमात्मनः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

हार कहीं खो यया“ इस भ्रम से यत्र तत्र खोज रहे पुरुष को अपने गले मे ही उत्ते दिख जाने पर हार प्राप्ति जैसे आश्चर्यभरूत होती है, वैसे ही उस साक्षी के केवल दर्शन से ही सुरघु को आत्मप्राप्ति आश्वर्यभरूत हुई, उसे दिखलाते हैं। अहो अत्यन्त आश्चर्य का विषय है अनादि काल से लेकर प्रयत्न कर रहा लब्धात्मा भी मैं आज ही परम पुरुषार्थस्वरूप फलका भाजन हुआ, (क्योकि आज तक मैं अज्ञान में डूबा हुआ था) यह मैं तत्पदबोध से असीम आत्मरूप हूँ, इस परम आत्मा का कहीं पर अन्त नहीं है