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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verse 38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

विगतरञ्जननिर्विषयस्थितिर्गतभवभ्रमरञ्जितवर्जिते । स्थिरसुषुप्तकलाभिगतस्ततः समसमं निवसाम्यहमात्मनि ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

राग, द्वेष आदि दोषों के निकल जाने के कारण मेरी जाग्रत्‌, स्वप्न और सुषुप्तिरूपी तीनों अवस्थाएँ चली गई हैँ । तथा निश्चल सुषुप्ति कला से उपाधियों के हट जाने के कारण मैं परब्रह्म के साथ एकता को प्राप्त हुआ हूँ, इसलिए मैं संसार भरम से रहित अतएव आकाश आदि अध्यारोपरूपी राग से शून्य प्रत्यक्‌ -ब्रह्म में परम समता से (आत्यन्तिक अभेद से) निवास करता हूँ, अब कभी मेँ फिर विषमता को प्राप्त नहीं होऊँगा, यह भाव हे