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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

मूलं संसृतिदोषस्य मनो नाहं जडं हि तत् । अथ बुद्धिरहंकार इति दृष्टिर्मनोमयी ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

संसाररूपी दोष का मूल कारण मन मैं नहीं हूँ, क्योंकि वह अचेतन है । अनन्तर अब दृष्टात्मक (जाने जाते हैं, इसलिए दृष्टात्मक) बुद्धि और अहंकार भी मैं नहीं हूँ और वे मेरे नहीं हँ क्योकि अन्तःकरण की अवस्थारूप होने के कारण वे तो जड़ हैं