Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verse 33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
क्व तौ कीदृग्विधौ वापि किंनिष्ठौ वा किमात्मकौ ।
निग्रहानुग्रहौ लोके हर्षामर्षक्रमौ तथा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् में जो यह सब कुछ दृश्य दिखाई देता है, वह
चिन्निष्पन्दांश मात्रांश से चित् का निष्पन्द यानी माया से जीवभाव का विभ्रम, उसका अंश है पाँच
ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि इन सत्रह अवयवों से युक्त लिंग शरीर का भ्रम,
इसकी मात्राएँ हैं -बाह्य ओर अन्तःकरण के अभेद विभ्रम, इनका अंश है - जाग्रत् और स्वप्न के दृश्यों
का विभ्रम, निष्कर्ष यह निकला कि माया से होनेवाले चित् के जीवभ्रम के अंशभूत सत्रह अवयवोंवाले
लिंग शरीर के मात्राभूत बाह्य ओर अन्तःकरण के अभेद विश्रमों के अंश जाग्रत् और स्वप्नों के दृश्यों के
विभ्रम से) भिन्न दूसरा स्थायी यानी त्रिकालाबाध्य कुछ भी नहीं है ॥ ३ २॥
पूवोक्त प्रणाली से जव जगत् मिथ्या सिद्ध हुआ, तव निग्रह और अनुग्रह तथा उनके हेतु हर्ष और
अमर्ष भी निराश्रय, प्रकाररहित, विषयरहित और स्वरूप-रहित ही सिद्ध हुए, ऐसा कहते हैं।
लोक में वे निग्रह ओर अनुग्रह कहाँ है, किस तरह के हैं, किस मैं रहते हैं, उनका रूप क्या है, इसी
तरह उनके हेतु हर्ष और अमर्ष की परम्परा भी कहाँ है अर्थात् सभी व्यर्थ यानी मिथ्या ही हैं