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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 55

27 verse-groups

  1. Verse 1सत्तासामान्य का लक्षण बताने की कृपा कीजिए
  2. Verse 2श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जब चित्‌ पूर्ण शुद्ध है, उसमें कुछ नहीं है, ऐसी…
  3. Verse 3समस्त वृत्तियों में प्रतिबिम्बित चैतन्य जब सकल प्रपच का बाध होने पर अन्तःकरण की वृत्तियों…
  4. Verse 4चित्त की वृत्तियो मे अभिव्यक्त हुआ अखण्ड चैतन्य जब बाह्य एवं आभ्यन्तर का जो कुछ है इन सबक…
  5. Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, जब चित्त की वृत्तियो मेँ अभिव्यक्त हुआ अखण्ड चैतन्य समस्त भूतप्रपंच क…
  6. Verse 6हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस प्रकार कछुआ अपने-आप ही अपने में अंगों को लीन कर लेता है उसी प्रका…
  7. Verse 7हे श्रीरामचन्द्रजी, चूँकि यह उक्त सप्तम भूमिका रूढ़दृष्टि तुर्यातीत पद के समान है, इसीलिए…
  8. Verse 8हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, यह बोध से उत्पन्न दृष्टि पंचमादि भूमिकाओं में भी समाधिस्थ ज्ञ…
  9. Verse 9जिस प्रकार पृथिवी पर प्रसिद्ध पारदादि (पारा आदि) रस एवं आकाशरूपी गली में वायु किसी वस्तु…
  10. Verse 10उसीका उदाहरण देते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, आस्मत्प्रभृति अर्थात्‌ हमारे सदृश्य मनुष्य लोक…
  11. Verse 11हे श्रीरामचन्द्रजी, समस्त भय का नाश करनेवाली इस पदवी का अवलम्बन करके वे उद्दालक प्रारब्धक…
  12. Verse 12इसके अनन्तर बहुत काल के बाद उद्दालक की यह दृढ बुद्धि हुई कि में इस देह को छोडकर विदेह मुक…
  13. Verse 13हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार चिन्तित अर्थ में दृढ़ निश्चयवाले वे उद्दालक ऋषि बद्ध पद्मास…
  14. Verse 14मलद्वार के अवरोध से नव द्वारों का संयम कर शब्द-स्पर्शादि विषयक वृत्तियों को बदरी फल की तर…
  15. Verses 15–18हे श्रीरामचन्द्रजी, प्राणवायुओं को रोकते हुए, समरूप से स्थित कण्ठवाले, तालू के मूलतल में…
  16. Verse 19उस उद्दालक ऋषि का पूर्ववत्‌ सत्तासामान्य अनुप्रवेश कहते हैं। जब तक निरतिशय आनन्द का आस्वा…
  17. Verse 20विक्षेप-वैषम्य से सर्वथा रहित स्वभाववाले एवं अनुपम आनन्द से अत्यन्त मनोहर मुखकान्तिवाले व…
  18. Verse 21आनन्द के आविभवि के द्योतक रोमांच चिह्नों की भी क्रम से उपरति दिखलाते हैं। हे श्रीरामचन्द्…
  19. Verse 22हे श्रीरामचन्द्रजी, वे महात्मा उद्दालक चित्रलिखित के समान अनन्यचित्त एवं अचल होकर समस्त क…
  20. Verse 23“न तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवनीयन्ते“ इस श्रुति में कहे गये प्रकार के अनुसार उन्ह…
  21. Verse 24प्राणों के उपशमन होने पर उनके परिशिष्ट स्वरूप को कहते हैं। समस्त संशयों का विनाश हो जाने…
  22. Verse 25वह उद्दालक ब्राह्मण प्रति ब्रह्माण्ड के भेद से अनन्त आकाशों को व्याप्त करनेवाली दिशाओं को…
  23. Verse 26इसके अनन्तर उद्दालक के जीवात्मा के निर्मलस्वरूप आद्य पद को प्राप्त होने पर उस उद्दालक ब्र…
  24. Verse 27जिसके अनन्तर चिरकाल बाद उस पर्वतभूमि पर, जहाँ उद्दालक का शव पडा हुआ था, पर्वत के न्याय के…
  25. Verse 28उन माताओं में से समस्त पण्डितो की एवं देवताओं की भी पूज्य रात्रि के समय नूतन-नूतन आभूषणों…
  26. Verse 29जिसका मूढदुष्टि लोगो से कल्पित, मलमांसादि से निर्मित स्थूल शरीर भी तीनों लोको से वन्दनीय…
  27. Verse 30उक्त उद्दालक के आख्यान का उपसंहार करते हुए उस आख्यान का परिशीलन करनेवाले मनुष्यों २ इससे…