Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verses 15–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, verses 15–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 15-18
संस्कृत श्लोक
संरुद्धप्राणपवनः समसंस्थानकन्धरः ।
तालुमूलतलालग्नजिह्वामूलो लसन्मुखः ॥ १५ ॥
न बहिर्नान्तरे नाधो नोर्ध्वे नार्थे न शून्यके ।
संयोजितमनोदृष्टिर्दन्तैर्दन्तानसंस्पृशन् ॥ १६ ॥
प्राणप्रवाहसंरोधसमः स्वच्छाननच्छविः ।
अङ्ग चित्संविदुत्तानरोमकण्टकिताङ्गभूः ॥ १७ ॥
अङ्गचित्संविदाभ्यासाच्चित्सामान्यमुपाददे ।
तदभ्यासादवापान्तरानन्दस्पन्दमुत्तमम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, प्राणवायुओं को रोकते हुए, समरूप से
स्थित कण्ठवाले, तालू के मूलतल में फाटक के समान लगे हुए जिह्लामूल से उन्नत हुए-से सुन्दर
मुँहवाले, न बाहर न भीतर, न नीचे, न ऊपर, न रूपादि विषयों में, न शून्यआकाश में कहीं भी मन
और दृष्टि को संयुक्त न कर रहे एवं दाँतों से दाँतों का स्पर्श न कर रहे तथा प्राणों के प्रवाहों के
अवरोध से सम यानी उनकी क्रियाओं से उत्पन्न हुए शरीर, मन और इन्द्रियों के चांचल्य से शून्य,
प्रसन्नवदन, चिद्रूप ब्रह्मानन्द के अनुभव से सीधे खड़े हुए रोंगटों से पुलकित शरीरवाले वे उद्दालक
ऋषि अन्तःकरण के एकदेशभूतवृत्तिभेदों में प्रतेबिम्बित चित् के निरन्तर अनुसन्धान से स्वोपाधिभूत
वृत्ति भेदों के विलयाभ्यास के कारण बिम्भभूत चित् सामान्य को प्राप्त हो गये एवं उन्होंने बिम्बभूत
चिन्मात्र के अनुसन्धान अभ्यासवश हृदय में सर्वोत्कृष्ट आनन्द प्रवाह का अनुभव किया