Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
संयम्य गुदसंरोधाद्द्वाराणि नव चेतसः ।
मात्रास्पर्शान्विचिन्वानो भावितस्वाङ्गचिद्धनः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
मलद्वार के अवरोध से
नव द्वारों का संयम कर शब्द-स्पर्शादि विषयक वृत्तियों को बदरी फल की तरह एक-एक चुनकर
हृदय में उनका निवेश करके फिर उनके पारमार्थिकस्वरूप की अपने अंग के समान भावना कर
अर्थात् स्वात्मा के साथ एेक्य स्थापित कर चिदात्मा एवं सेन्धवघन के समान एक रस हुए उद्दालक
ने चित्सामान्य को प्राप्त किया