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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 29

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

इत्युद्दालकदेहकं सुविलसन्मायूरबर्हव्रजव्यालोलाब्दलवे नवैर्विवलिते मन्दारमालागणैः । शेते खिंखिनिका महाभगवती लीलाललामे लताजाले भृङ्ग इवान्तपुष्पपटले पश्चादुपागच्छति ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

जिसका मूढदुष्टि लोगो से कल्पित, मलमांसादि से निर्मित स्थूल शरीर भी तीनों लोको से वन्दनीय देवी के सिर का भूषण बनकर सर्वोत्कर्षं पा गया, उस विषय में विशेष क्या कहा जाय, यों ज्ञान के महत्त्व का उत्कर्ष दिखलाते हुए कहते है । इस प्रकार उद्दालक ऋषि का वह तुच्छ शरीर महाभगवती चामुण्डा के लीला विलास के लिए बने हुए शिराभूषणों की उस माला में आनन्द के साथ सो गया जिस माला में मोरों के (मयूरो के) मनोहर पुच्छरूपी चंचल मेचखण्ड विराजमान थे ओर जो मालानूतन-नूतन मन्दार पुष्पों से परिवेष्टित थी और जिसके अग्रभागो में पुष्पों का गुच्छा था अतएव वेणी के (चोटी के) छल से पीछे आ रहे लता-जाल पर मानों भौरा (भ्रमर) आनन्द से लेटा हो, ऐसा वह शव मालूम हुआ