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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

गतसकलविकल्पो निर्विकारोऽभिरामः सकलमलविलासोपाधिनिर्मुक्तमूर्तिः । विगलितसुखमाद्यं तत्सुखं प्राप यस्मिंस्तृणमिव जलराशावूह्यते शक्रलक्ष्मीः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राणों के उपशमन होने पर उनके परिशिष्ट स्वरूप को कहते हैं। समस्त संशयों का विनाश हो जाने से निःसन्देह अतएव विकाररहित एवं समस्त तुच्छ विषयों में आसक्त हुई अन्तःकरणवृत्तियों से रहित स्वभाववाले अतएव अभिराम (मनोहर) वे उद्दालक ऋषि हिरण्यगर्भपदपर्यन्त सब विषयसुख अग्नि से चिन्गारियों की तरह जिससे बाहर निकले थे, ऐसे वाणी के अगोचर उस सुख को प्राप्त हो गये, जिस सुख को प्राप्त करके इन्द्रलक्ष्मी भी (इन्द्र का ऐश्वर्य भी) समुद्र में तृण के समान समझी जाती है