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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

गतवति पदमाद्यं चेतसि स्वच्छभावं द्विजतनुरथ मासैः सोपविष्टैव षड्भिः । रविकरपरितप्ता वातभांकाररम्या तनुतरुभुजतन्त्री शैलवीणा बभूव ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके अनन्तर उद्दालक के जीवात्मा के निर्मलस्वरूप आद्य पद को प्राप्त होने पर उस उद्दालक ब्राह्मण का शरीर छःमास तक वहीं पड़ा हुआ सूर्य की किरणों से तप्त होकर सूख गया ओर बह रहे वायु की टक्कर से उत्पन्न हुए भयंकर शब्द से रमणीयता को प्राप्त करता हुआ बाल वृक्षरूपी भुजाओं की बजाने योग्य शिरातन्त्रियों से पर्वत के विलास के लिए वीणा हो गया