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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

एषोद्दालकचित्तवृत्तिकलनावल्ली विवेकस्फुर त्स्वानन्दप्रविकासभासिकुसुमा हृत्कानने विस्तृता । रूढा यस्य कदाचिदेव विहरन्नप्येव सच्छायया नासावेति वियोगमेति सफलेनोच्चैस्तरां संगमम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त उद्दालक के आख्यान का उपसंहार करते हुए उस आख्यान का परिशीलन करनेवाले मनुष्यों २ इससे उसकी सर्वाधिष्ठानता अभिव्यक्त हुई, अतः कोई वस्तु उससे भिन्न नहीं है । के संसाररूपी ताप उपशमन और परम पुरुषार्थ का लाभ दिखलाते है । समस्त दृश्य पदार्थो के विवेक में स्फूर्ति को प्राप्त हुए आनन्दरूपी विकसित पुष्पोंवाली, पूर्वोक्त प्रकार से प्रदर्शित उद्दालक के विदेहकैवल्य प्राप्ति पर्यन्त चरित्र की आदर एवं निरन्तर अभ्यास से हुई शिक्षारूपी कल्पवल्ली (कल्पलता) जिस पुरुष के हृदयरूपी वन में उत्पन्न होकर उत्तरोत्तर भूमि में आरूढ होकर फैल गई, वह पुरुष तीनोंतापरूप (आधिभोतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तीनों तापरूपी) सूर्य से व्याप्त व्यवहाररूपी कानन में विहार करता हुआ भी सत्य, शान्ति, दान्ति आदिगुणों से सुगन्धित, शीतल व सहज संतोषस्वरूप छाया से कभी भी वियुक्त नहीं होता । अपितु सर्वोत्कृष्ट मोक्षफल के साथ “न स पुनरावर्तते" इस श्रुति के अनुसार पुनरावृत्तिरहित स्वात्मभाव से सम्बन्ध को प्राप्त करता है इसलिए ऐसी लता का हृदय में आरोप करके विस्तार करना चाहिये