Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अपरिमितनभोन्तर्व्यापिदिग्व्यापि पूर्णं भुवनभरणशीलं भूरिभव्योपसेव्यम् ।
कथनगुणमतीतं सत्यमानन्दमाद्यं परमसुखमनन्तं ब्राह्मणोऽसौ बभूव ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह उद्दालक ब्राह्मण प्रति ब्रह्माण्ड के भेद से अनन्त
आकाशों को व्याप्त करनेवाली दिशाओं को भी व्याप्त करनेवाला अर्थात् देशकृत परिच्छेद से रहित,
सर्वदा समस्त वस्तुओं में पूर्ण, सकल वस्तुओं के आधारभूत भुवनों का धारण-पोषण करनेवाला
(०3) बड़े भाग्यों से और उत्तम जनों से सेवा करने योग्य, वाणी के अगोचर, अनन्त, आद्य अर्थात् काल
से अपरिच्छिन्न, पारमार्थिक सत्तावाले, सबको ब्रह्मरूप एक रस में मस्त करनेवाले सर्वोत्कृष्ट भूमाख्य
परम सुखस्वरूप ही हो गये