Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 31
तीसवाँ सर्ग समाप्त इकतीसवाँ सर्ग प्रह्लाद का श्रीहरि के पराक्रम का चिन्तन, आत्मीयो के कल्याण का विचार और भगवद्भक्ति से भगवद्भाव का वर्णन |
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- Verses 1–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर पातालगर्त में, जहाँ दानवों का विनाश किय…
- Verse 5बड़ा खेद हे, बाहरी और भीतरी सब सम्पत्तिरूपी प्रकाशो को हरनेवाले अद्भुत अन्धकार के तुल्य ह…
- Verses 6–8हमारे मित्ररूपी अर्धरात्रि के कमल तडाग, जिनके हृदय अन्धकार से पूर्ण हैं, और जिनकी पंखुडीर…
- Verses 9–11हाथी के सदृश थे, वे भी आज देवताओं के सदृश दीनता को प्राप्त हुए है । अहो, भाग्य के लिए क्य…
- Verses 12–13जैसे गाँव में गई हुई भयभीत मृगियाँ तनिक पत्ते के फड़कने पर भी डरती हैं वैसे ही दैत्यों की…
- Verse 14देवताओं ने उस नन्दनवन मं दिव्यवस्त्रों से युक्त लता ओर पत्तेवाले रत्नों के गुच्छों से लदे…
- Verse 15पहले असुरों ने देवताओं की बन्दी नारियों केसुन्दर मुख प्रशंसा के साथ देखे थे, लेकिन अब असु…
- Verse 16मालूम पड़ता है, देवताओं की ऐरावत आदि हाथियों के गण्डस्थल में बह रही मदधारारूपी महानदियाँ…
- Verse 17मद के दाह से उत्पन्न हुई राख हमारे हाथियों के सूखे हुए गण्डस्थलं में सूखे हुए मरुस्थलों क…
- Verse 18फूले हुए सफेद मन्दार के परागयुक्त मकरन्दो से रंगे हुए वायु जिनका अंगस्पर्श करते थे, अतएव…
- Verse 19पहले दानवों के अन्तःपुर में अभ्यस्त (चिरकाल तक निवास कर चुकी) देवता ओर गन्धर्वो की सुन्दर…
- Verse 20बड़े खेद की बात है, मेरे पिताजी की पटरानियों के सूखे हुए कमलों की तरह नीरस विलासों की अप्…
- Verses 21–24पहले जो चवर मेरे पिता पर डुलाये गये थे, बड़े खेद की बात है, वे ही आज स्वर्ग में इन्द्र पर…
- Verse 25भगवान के पराक्रम से अलंकारों को भी अलंकृत करनेवाले असुरनारियों के मुखारविन्द पर कमलिनियों…
- Verse 26जगद्रूपी जीर्ण-शीर्ण मकान की जीर्ण-शीर्ण, टूटी-फूटी दीवारें गिर रही है, उसे नीलमणि के स्त…
- Verses 27–31जैसे क्षीर सागर के मध्य में डूबे हुए मन्दराचल के धारणकर्ता कच्छप भगवान हैं वैसे ही विपत्त…
- Verses 32–34उन्होने हमारे बाप-दादों के साथ बहुत से भयंकर युद्ध कौशलों का अभ्यास किया है जिनमें परस्पर…
- Verses 35–36क्यो दूसरा प्रतीकार का उपाय नहीं है, ऐसा कहते हैं। जगत में सब वस्तुओं के स्वभाव से सब प्र…
- Verses 37–39और लोग शरण क्यो नहीं हो सकते ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं। तीनों लोकों में उनसे बढ़ कर कोई…
- Verses 40–41यदि कोई कहे कि किसलिए तुम ऐसी कल्पना करते हो, तो इस पर कहते हैं । स्वयं विष्णु हुए बिना व…
- Verses 41–46अब श्रीहरि के वाहन, अस्त्र, आभरण, शरीर आदि की अपने रूप से कल्पना करते हैं। इस असीम आकाश क…
- Verses 47–51निरन्तर अनेक जगतों का नूतन निर्माण करनेवाली अपने इन्द्रजाल से शोभित होनेवाली यह विष्णु की…
- Verse 52यह सुन्दर कमल मेरी हथेली पर विद्यमान है, जो मेरी नाभि से उत्पन्न हुआ है और जिसकी कर्णिका…
- Verse 53यह रत्नों से चित्र-विचित्र शरीरवाली अतएव सुमेरु के शिखर के तुल्य, सोने से मठी हुई मेरी भा…
- Verse 54यह सूर्य के समान चमकीला मेरा सुदर्शन चक्र है, जिससे सदा किरणें बाहर फूट रही हैं और जो चार…
- Verses 55–56यह धूम्रयुक्त अग्नि के समान सुन्दर काला ओर चमकीला मेरा अन्दकनामक खड्ग है । यह दैत्यरूपी व…
- Verses 57–61मैं उत्पन्न होकर नष्ट हुए अतीत ओर वर्तमान इस अनेक जगतो को अपने उदर में चिरकाल तक धारण करत…
- Verses 62–66कोन मेरा विरोधी होकर त्रैलोक्य को भस्म करने में समर्थ मेरे प्रति युद्ध के लिए आता है ? जो…