Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 37–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 37–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 37-39
संस्कृत श्लोक
अस्मान्निमेषादारभ्य नारायणमजं सदा ।
संप्रपन्नोऽस्मि सर्वत्र नारायणमयो ह्यहम् ॥ ३७ ॥
नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ।
नापैति मम हृत्कोशादाकाशादिव मारुतः ॥ ३८ ॥
हरिराशा हरिर्व्योम हरिरुर्वी हरिर्जगत् ।
अहं हरिरमेयात्मा जातो विष्णुमयो ह्यहम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
और लोग शरण क्यो नहीं हो सकते ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
तीनों लोकों में उनसे बढ़ कर कोई भी नहीं हैं। सृष्टि, प्रलय, ओर संहार के एकमात्र हेतु हरि ही हैं ॥ ३ ६॥
ऐसा विचारकर सर्वात्मना उनकी शरणागति का संकल्प करते हैं।
इस क्षण से मैं सदा अजन्मा नारायण की शरण में प्राप्त हुआ हूँ । सब देश, सब काल और सब
वस्तुओं में मैं नारायणमय हूँ। निरन्तर भगवान की शरणागति, धारणा, स्मरण और जप के साधनभूत
उनके श्रोत मन्त्र का स्मरण कर निरवच्छिन्न उसके जप का संकल्प करते हैँ । जैसे आकाश से वायु
कभी नहीं हटता वैसे ही सब पुरुषार्थो का साधक “नमो नारायणाय” (७४५) यह मन्त्र मेरे हदयकोश
से दूर न हो।
सब देश, सब काल और सब वस्तुओं मे मैं नारायणमय हूँ, ऐसा जो कहा था, इसका स्पष्टीकरण
कहते हैं ।
हरि दिशा हैं, हरि आकाश हैं, हरि पृथ्वी हैं, हरि जगत हैं और अप्रमेयात्मा हरि मैं हूँ मे भावनावश
प्रायः विष्णु हो गया हूँ