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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 62–66

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 62–66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 62-66

संस्कृत श्लोक

को मामेति विरुद्धात्मा त्रैलोक्यदहनक्षमम् । स्वनाशाय ततः क्षुब्धं कालाग्निं शलभो यथा ॥ ६२ ॥ इमे मे तैजसीं सृष्टिं ममाग्रस्थाः सुरासुराः । न शक्नुवन्ति संरोद्धुं चक्षुर्मन्दाः प्रभा इव ॥ ६३ ॥ इमं मामीश्वरं विष्णुं ब्रह्मेन्द्राग्निहरादयः । स्तुवन्त्यनन्तया वाचा बहुवक्त्रसमुत्थया ॥ ६४ ॥ अयं विजृम्भितैश्वर्यो जातोऽहमजिताकृतिः । सर्वद्वन्द्वपदातीतो महिम्ना परमेण हि ॥ ६५ ॥ त्रिभुवनभवनोदरैकमूर्ति प्रसभविभिन्नसमस्तदुष्टसत्त्वम् । घनगिरितृणकाननान्तरस्थं सकलभयापहरं वपुः प्रणौमि ॥ ६६ ॥

हिन्दी अर्थ

कोन मेरा विरोधी होकर त्रैलोक्य को भस्म करने में समर्थ मेरे प्रति युद्ध के लिए आता है ? जो आता है, वह क्षुब्ध हुई कालाग्नि के प्रति शलभ (तीड) जैसे अपने नाश के लिए आता हे वैसे ही स्वविनाश के लिए आता है । ये मेरे सामने खड़े हुए सुर और असुर जैसे कमजोर नेत्रवाले लोग सूर्य की प्रभा को नहीं सह सकते वैसे ही मेरे तेज की ज्वाला ओं को नहीं सह सकते । ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, शिवआदि देवता बहुत से मुखो से निर्गत वेदवाणी से इस ऐश्वर्यशाली विष्णुरूप मेरी स्तुति करते हैं । विपुल ऐश्वर्यवाला मैं विष्णु की आकृतिवाला हो गया हूँ ओर परमार्थ स्वभाव से सब द्वन्द्वो से अतीत हो गया ह । जिसके उदर में त्रिभुवनरूपी भवन स्थित है ऐसी मूर्तिवाला, सब दुष्ट प्राणियों को छिन्न-भिन्न कर चुका, मेघ, पर्वत, तृण, वन आदि सब वस्तुओं के अधिष्ठानरूप से स्थित ओर सब भयो को दूर करनेवाला विराट्रूप परब्रह्मात्मक मैं ही हू । उसे मैं प्रणाम करता हूँ