Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 40–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 40,41
संस्कृत श्लोक
अविष्णुः पूजयन्विष्णुं न पूजाफलभाग्भवेत् ।
विष्णुर्भूत्वा यजेद्विष्णुमयं विष्णुरहं स्थितः ॥ ४० ॥
हरिः प्रह्रादनामा यो मत्तो नान्यो हरिः पृथक् ।
इति निश्चयवानन्तर्व्यापकोऽहं च सर्वतः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि किसलिए तुम ऐसी कल्पना करते हो, तो इस पर कहते हैं ।
स्वयं विष्णु हुए बिना विष्णु की पूजा करता हुआ पुरुष पूजा का फल-भागी नहीं होता है। अतः
विष्णु बनकर विष्णु की पूजा करनी चाहिये, इसलिए मैं विष्णुरूप से स्थित हुआ हूँ, क्योकि “नाविष्णुः
पूजयेद्विष्णुं" नाशिवः पूजयेच्छिवम्" ऐसी विधि है । जो हरि है वही प्रह्लनादनामक हे प्रत्यगात्मा से अन्य
हरि पृथक् नहीं है ऐसा मन में निश्चयवाला मैं सर्वव्यापक हूँ