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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 12–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

मनाक्चलति पर्णेऽपि दृष्टारिभयभीतयः । वध्वस्त्रस्यन्ति विध्वस्ता मृग्यो ग्रामगता इव ॥ १२ ॥ आसुरीकर्णपूरार्थ फुल्ला रत्नगुलुच्छकाः । नरसिंहकरालूनाः स्थाणुतामागता द्रुमाः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे गाँव में गई हुई भयभीत मृगियाँ तनिक पत्ते के फड़कने पर भी डरती हैं वैसे ही दैत्यों की सत्रिया, जिनको शत्रुभय का अनुभव हो चुका है, तनिक पत्तों के फड़कने पर भी डरती हैं। असुर नारियों के कर्णफूल बनाने के लिए लगाये गये रत्नों के गुच्छेवाले फूले हुए दिव्य वृक्ष नरसिंह के हाथों से तहस-नहस होकर ठुंठ बन गये हैं