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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 35–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

सर्वात्मना सर्वधिया सर्वसंरम्भरंहसा । स एव शरणं देवो गतिरस्तीह नान्यथा ॥ ३५ ॥ न तस्मादधिकः कश्चिदस्ति लोकत्रयान्तरे । प्रलयस्थितिसर्गाणां हरिः कारणतां गतः ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

क्यो दूसरा प्रतीकार का उपाय नहीं है, ऐसा कहते हैं। जगत में सब वस्तुओं के स्वभाव से सब प्रकार की बुद्धियों से और सब प्रकार के कर्मो के उद्योगों से शरणार्थी लोगों के लिए एकमात्र भगवान ही शरण है, अन्यथा गति नहीं है