Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 47–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 47–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 47-51
संस्कृत श्लोक
अनारतजगज्जालनवनिर्माणकारिणी ।
इयं मे पार्श्वगा माया स्वेन्द्रजालविलासिनी ॥ ४७ ॥
इयं सा हेलयाक्रान्तत्रैलोक्यतरुखण्डिका ।
जया स्फुरति मे पार्श्वे लता कल्पतरोरिव ॥ ४८ ॥
इमौ मे नित्यशीतोष्णौ देवौ शीतांशुभास्करौ ।
प्रकटीकृतसंसारौ मुखमध्ये विलोचने ॥ ४९ ॥
ममेयमुत्पलश्यामा पीनाम्भोधरसुन्दरी ।
श्यामीकृतककुप्चक्रा देहदीप्तिर्विसर्पिणी ॥ ५० ॥
अयं मम करे शङ्खः पाञ्चजन्यः स्फुरद्ध्वनिः ।
मूर्तं खमिव शब्दात्मा क्षीरोद इव संस्थितः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
निरन्तर अनेक
जगतों का नूतन निर्माण करनेवाली अपने इन्द्रजाल से शोभित होनेवाली यह विष्णु की माया मेरे समीप
में स्थित है । जिसने अनायास त्रैलोक्य की वृक्षराशियों पर विजय प्राप्त की है, ऐसी कल्पवृक्ष की लता
के तुल्य यह लक्ष्मी की सखी जया मेरी दूसरी बगल में विराजमान हो रही हे । नित्य शीतल और नित्य
उष्ण चन्द्रमा और भास्कर ये दो देवता मेरे मुँह में मेरे दो लोचन हैं, जिन्होंने संसार को प्रकाशित कर
रक्खा हे । मेरी नील कमल के समान श्यामल, मेघ के समान सुन्दर, फेल रही यह देहकान्ति है, इसने
दिशाओं को श्मामल बना रक्खा हे । यह पाँचजन्य शंख मेरे हाथ में है, जो मूर्तिमान आकाश के समान
शब्दरूप है, क्षीरसागर के समान शुभ्र हे ओर जिससे सदा ध्वनि निकलती है