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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 6–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 6–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 6-8

संस्कृत श्लोक

तमःप्रपूर्णहृदयाः संकुचत्पत्रसंपदः । सुहृदः खेदमायान्ति निशीथकमलाकराः ॥ ६ ॥ तातस्य मलिनैर्नूनं पादपीठोपमर्दकैः । सुरैर्विषय आक्रान्तो मृगैरिव महावनम् ॥ ७ ॥ निरुद्यमा गतश्रीका दीनाः प्रकटिताशयाः । बान्धवा न विराजन्ते पद्माः प्लुष्टदला इव ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

हमारे मित्ररूपी अर्धरात्रि के कमल तडाग, जिनके हृदय अन्धकार से पूर्ण हैं, और जिनकी पंखुडीरूपी संपत्ति दिन -पर-दिन संकुचित हो रही है, कैद को प्राप्त हो रहे है । जो प्रणाम के समय मेरे पिताजी के चरण-कमल का स्पर्श करते थे द्वेष से कलुषित देवताओं ने, हमारा देश ऐसे आक्रान्त कर दिया है जैसे सिंह मृग के वन को आक्रान्त करे | जो अपना हृदयवर्ती महादुःख सबके आगे कहते फिरते हैं उद्यमरहित, कान्तिहीन तथा दीनहीन हमारे बान्धव, ग्रीष्म ऋतु में जिनकी पंखुड़ियाँ झुलस चुकी हो ऐसे कमलो के समान शोभित नहीं होते हैं