Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, Verses 9–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 31, verses 9–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
स्फुरन्त्यसुरवीराणां गृहेष्वविरतानिलैः ।
धूसरा भस्मनीहारा धूपधूमभरा इव ॥ ९ ॥
हृतद्वारकपाटासु दैत्यान्तःपुरभित्तिषु ।
प्रभा मरकतस्येव जाता नवयवाङ्कुराः ॥ १० ॥
त्रिलोकीनाभिनलिनीमत्तेभा दानवा अपि ।
देववद्दैन्यमायाताः किमसाध्यमहो विधेः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हाथी के सदृश थे, वे भी आज देवताओं के सदृश दीनता को प्राप्त हुए है । अहो, भाग्य के लिए क्या
असाध्य है ?