Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 59
अद्रावनर्वौँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग विषयों की निःसारता, ब्रह्मा के संकल्प से जगत की रचना, ब्रह्मा की निर्वेद से विश्रान्ति और शास्त्र सृष्टि का वर्णन |
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- Verse 1प्रसंग प्राप्त कच गाथा को समाप्त करके भोग तत्वज्ञ की इच्छा आदि के योग्य नहीं है, इस विषय…
- Verse 2यदि कोई शंका करे कि मोक्ष के समान काम भी पुरुषार्थ ही है, उसकी भी वांछा करनी ही चाहिये ।…
- Verses 3–11जो पुरुष लोक में यह सत्य है, यों विश्वास को प्राप्त होते हैं, मनुष्यों में गर्दभ रूप उनसे…
- Verse 12यदि शंका हो कि हमारे चित्त की स्थिति के अनुसार देहादि जगत उत्पन्न हुआ है, फिर आप कैसे कहत…
- Verse 13प्रसंगवश श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्मा के मन के जगत्कल्पनाक्रम को पूछते हैँ । श्रीरामचन्द्रजी न…
- Verse 14श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, कमलकोशरूप विस्तार से उठ करके सर्वप्रथम बालक ब्र…
- Verse 15उत्थानरूप जाग्रत की कल्पना के बाद सकल संकल्पात्मक मनों के समष्टिरूप एवं अपने ही मन से चतु…
- Verses 16–18सूर्य आदि प्रकाश के अधीन सव व्यवहार हैं, अतः पहले आदित्य की सृष्टि को कहने की इच्छा से श्…
- Verse 19उस तेज में अपने सदृश दूसरी मूर्ति की कल्पना द्वारा हिरण्यगर्भ का प्रवेश कहते हैं। तेजोमण्…
- Verse 20तदनन्तर वह देव उस पिण्डीभूत तेज से आदित्य बनकर आज भी प्रत्यक्ष उदित होता है, वह प्रभा समू…
- Verse 21उसके चारों ओर जल रही ज्वालाओं की पंक्तियों को धारण करनेवाली धधकती हुई अग्नियाँ हैं और वह…
- Verses 22–23तदनन्तर मरीचि आदि प्रजापतियों की सृष्टि कहते हैं। तदनन्तर विश्व की वृद्धि करनेवाले सर्वज्…
- Verse 24उनसे देव, दानव, यक्ष, राक्षस, मनुष्य आदि की सृष्टि का प्रवाह कहते हैं। वे प्रजापति जिन-जि…
- Verse 25तदन्तर यज्ञादि कर्मो की प्रवृत्ति दिखलाते है । तदनन्तर वेदों का स्मरण कर फिर बहुत से यज्ञ…
- Verses 26–28इस प्रकार मन विशाल शरीरवाले ब्रह्मा का रूप धारण करके इस दृश्य सृष्टि का विस्तार करता है,…
- Verse 29यदि कोई शंका करे कि सव व्यवहार ब्रह्मा के मन से रचे गये हैं, ऐसी अवस्था में यज्ञ आदि शारी…
- Verse 30समष्टिदुष्टि से सब भूतो में और व्यष्टिदृष्ट से अथवा एक जीववाद से कुछ लोगों मे स्थित मन ही…
- Verse 31इस प्रकार का जगत सम्बन्धी मिथ्या मोह स्थिरता को प्राप्त हुआ है । संकल्प करनेवाले स्वयं मन…
- Verses 32–33संकल्प से ही सब जगत की क्रियाएँ उत्पन्न होती हैं और संकल्पवश ही नियति के अधीन देवतालोग उत…
- Verses 34–37इस प्रकार सृष्टि के विस्तार का वर्णन करके सृष्टि की निवृत्ति और शास्त्र के निर्माण में का…
- Verse 38उस परमात्मा को स्मरणमात्र से प्राप्त कर, जहाँ चारों ओर एकमात्र उन्हींका प्रकाश है, मानस व…
- Verse 39ममतारहित, अहंकारशून्य अतएव परमशान्ति को प्राप्त हुए क्षोभरहित ब्रह्मा निश्चल सागर की तरह…
- Verse 40किसी समय एकाकार वृत्ति की धारणा में आग्रहरूप ध्यान से भगवान ब्रह्मा स्वयं ऐसे विरत होते ह…
- Verse 41तब वे सुख-दुख से युक्त सैकड़ों आशापाशों से बंधे हुए, राग, द्वेष ओर भय से पीड़ित संसार का…
- Verses 42–43फिर दया से आक्रान्त चित्तवाले वे प्राणियों के कल्याण के लिए अध्यात्मज्ञान से भरे हुए गम्भ…
- Verse 44फिर पूर्वोक्त सप्तम भूमिकारूप परमपद को पाकर सृष्टि विक्षेपरूप परम आपत्तियों से छुटकारा पा…
- Verse 45कमलासन में स्थित हुए ब्रह्मा जगत की चेष्टा को देखकर और जगत की मर्यादा को ठीककर फिर आत्मा…
- Verse 46किसी समय सब संकल्पो से हीन स्वेच्छामात्र से केवल लोगों के अनुग्रह के लिए ही लोक के सदुश क…
- Verse 47तब तो समाधिकाल में उनकी सरलता, सृष्टि, संहार आदि के समय उस सरलता का त्याग, देह आदि का ग्र…
- Verse 48सब भावों का आरम्भ करनेवाले ब्रह्मा सब वृत्तियों में समान और परिपूर्ण सागर के समान आकारवाल…
- Verse 49किसी समय सम्पूर्ण संकल्पों से रहित अपनी स्वेच्छा से केवल लोगों के अनुग्रह के लिए ही वे प्…
- Verse 50हे महामते, जो मैंने आपसे कही, यह परम पवित्र ब्राह्म स्थिति हे । प्रजापतियों की मानसिक सृष…
- Verse 51उन पूर्वोक्त तीन अनीकों में (दलों में) पहला अनीक मानस उपासना का फल होने के कारण एक मात्र…
- Verses 52–53दूसरा दल औषधि पल्लवो के विकारभूत सोमरस, धृत, दूध से सिद्ध होनेवाले कर्म का फल है, अतः उनक…
- Verse 54तो क्या सव देवताओं की मुक्ति होती है ? इस पर नहीं, ऐसा कहते हैं। देवताओं में अथवा मनुष्यो…
- Verse 55क्रीडा-कोतुकों तथा क्रोध, लोभ से बढ़े हुए व्यवहारो से क्रमश: दृढ़ स्थिति को प्राप्त हुई त…