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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verses 3–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, verses 3–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 3-11

संस्कृत श्लोक

विश्वासं यान्ति ये लोके तैरलं नरगर्दभैः । इतः केशा इतो रक्तमितीयं प्रमदातनुः ॥ ३ ॥ एतया तोषमायान्ति सारमेया न मानवाः । मृन्महीदारुतरवो देहा मांसमया अपि ॥ ४ ॥ अधो भूरम्बरं पृष्ठे किमपूर्वं सुखाय तु । मात्रास्पर्शानुसारिण्यो विवेकपदभङ्गुराः ॥ ५ ॥ मोहायैवापरामृष्टाः सकला लोकसंविदः । सर्वस्या एव पर्यन्ते सुखाशायाश्च संस्थितम् ॥ ६ ॥ मालिन्यं दुःखमप्येवं ज्वालाया इव कज्जलम् । आगमापायिनोऽनित्या मनःषष्ठेन्द्रियक्रियाः ॥ ७ ॥ लता नागेन्द्रमृदिता धारयन्ति न संपदः । पुत्रिका रक्तमांसस्य कान्तेयमिति सादरम् ॥ ८ ॥ स्वदेहनाम्नाऽस्थिचये श्लिष्यते मोहकक्रमः । सर्वं सत्यमिदं राम स्थिरमज्ञस्य तुष्टये ॥ ९ ॥ ज्ञस्यास्थैर्यमसत्यं च जगद्राम न तुष्टये । अभुक्तेऽपि विषा यैषा विषमूर्च्छां प्रयच्छति ॥ १० ॥ तां परित्यज्य भोगास्थां स्वात्मैकत्वगतिं भज । अनात्ममयभावेन चित्तं स्थितिमुपागतम् । यदा तदैतदाजातं जगज्जालमसन्मयम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष लोक में यह सत्य है, यों विश्वास को प्राप्त होते हैं, मनुष्यों में गर्दभ रूप उनसे कोई भी प्रयोजन नहीं हे । इधर केश हैं तो इधर रक्त है, यही तो स्त्री का शरीर है, इससे जो सन्तोष को प्राप्त होते हैं, वे कुत्ते ही हैं मनुष्य नहीं। सारी पृथिवी मिट्टी ही है, सभी पेड़ काठ ही है और शरीर भी मांस के पुतले ही हैं। नीचे पृथिवी है, ऊपर आकाश ही है। भला बतलाइये तो सही सारभूत पदार्थ क्या है, जो सुख के लिए हो। सब लोक व्यवहार इन्द्रियों के स्पर्श के अनुसार होनेवाले, विवेक के तत्त्व में बाधित होनेवाले और बिना विचारे ही भले लगनेवाले हैं । जैसे ज्वाला के अन्त में काजल स्थित रहता है, वैसे ही सब सुखाशा का विषयों के लाभ से अथवा अलाभ से अन्त होने पर पाप, विषय आदि की कलुषता और वियोग, विषाद आदि से होनेवाला दुःख भी वर्तमान काल के सुख के समान ही रहता है। उत्पन्न ओर विनष्ट होनेवाली अतएव अनित्य मन और इन्द्रियों से उत्पन्न सब सम्पत्तियाँ गजराज से कुचली हुई लताओं के तुल्य क्षीण हो जाती है। कान्ता आदि का भोग केवल अनित्य ही नहीं है, किन्तु अभेध्य नरकरूप भी है, ऐसा कहते हैं। हड्डियों के समूह में देह नामवाला पुरुष रक्त और मांस की पुतली का यह मेरी प्रेयसी है, इस बुद्धि से सादर आलिंगन करता है यह मोहक काम का क्रम है। यह सब अज्ञानियों की दृष्टि में सत्य और स्थिर है, अतएव यह अज्ञानी की दृष्टि के लिए होता है, किन्तु हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानी की दृष्टि में अस्थिर और असत्य यह सब उनकी तुष्टि के लिए नहीं होता है। यह जो विषैली भोगतृष्णा है, वह भोग न करने पर भी विष के तुल्य मूर्च्छा पैदा करती है, भोग करने पर तो वह क्यों नहीं करेगी ? उस भोगास्था का त्याग करके स्वात्मैकत्वपद को प्राप्त होईये जब यह चित्त अनात्ममयरूप से स्थिति को प्राप्त हुआ, तभी यह असन्मय जगज्जाल उत्पन्न हुआ