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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

तिर्यञ्चः पशवो मूढा ये न तुष्यन्त्यसाधवः । भोगैः कृपणसर्वस्वैरादिमध्यान्तपेलवैः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि मोक्ष के समान काम भी पुरुषार्थ ही है, उसकी भी वांछा करनी ही चाहिये । ऐसा कहनेवाले के प्रति कहते हैं। जो मूढ असाधु पुरुष कृपणो के सर्वस्व तथा आदि, मध्य और अन्त में असत्‌ भोगों से सन्तुष्ट होते है, वे निरे पशु-पक्षी ही हैं