Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
या यत्सत्त्वं समन्वेति सा तदेवाशु जायते ।
जाता संसर्गवशतस्तस्मिन्नेव च जन्मनि ।
बध्यते मुच्यते वासौ स्वयमन्वारभेदतः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
तो क्या सव देवताओं की मुक्ति होती है ? इस पर नहीं, ऐसा कहते हैं।
देवताओं में अथवा मनुष्यों में उत्पन्न हुआ जो व्यक्ति ज्ञान-वैराग्य से सम्पन्न अथवा भोगलम्पट
जिस जीव की मैत्री आदि से संगति करता है, वह उसकी संगति से शीघ्र वैसे गुणवाला हो जाता
है। भोगलम्पट पुरुष से संसर्गवश स्वयं भी वैसा होकर उसी जन्म में बन्धन को प्राप्त होता है और
ज्ञानैश्वर्यसम्पन्न पुरुष की संगति से स्वयं भी ज्ञान-वैराग्य सम्पन्न होकर उसी जन्म में मुक्त हो
जाता है।
तब तीसरे अनीकरूप मनुष्यों को क्या करना चाहिए ? इस पर उनका कर्तव्य कहते हैं।
बन्ध और मोक्ष संगति के अनुसार होते हैं, इसलिए स्वयं ही अपने पौरुष प्रयत्न से साधुसंगति,
सत् शास्त्रों के श्रवण आदि एवं इन्द्रिय और मन की जय के उपायों का, जब तक फल की प्राप्ति न हो
तब तक अभ्यास करना चाहिये