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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । वैरिञ्चपदमासाद्य मनो ब्रह्मन्महामते । इदं जगत्सुघनतां कथमानयति क्रमात् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रसंगवश श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्मा के मन के जगत्कल्पनाक्रम को पूछते हैँ । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्‌, हे महामते, पूर्वं उपासक का मन पहले के व्यष्टि-अभिमान को समष्टिआत्मता की अतिशय भावना से उत्पन्न दृढ़ संस्कार द्वारा छोड़ कर, समष्टिसिद्धिरूप विरंचि का पद प्राप्त कर, कार्यभूत ब्रह्म बनकर इस जगत को क्रमशः कैसे सुघन (चार प्रकार के प्राणियों के समूह से निबिड) बनाता है ?