Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
मनोहस्तैर्विरिंचोत्थैर्यद्यथा कल्पितं पुरा ।
तत्तथैवाखिलं द्रष्टुं दृश्यतेऽद्यापि मायया ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि सव व्यवहार ब्रह्मा के मन से रचे गये हैं, ऐसी अवस्था में यज्ञ आदि
शारीरिक कर्म हैं और उपासना आदि मानसिक हैं, इस व्यवस्था में क्या हेतु है तो इस पर कहते हैं।
ब्रह्मा से उत्पन्न हुई मनोवृत्तियों से अथवा हाथों से जो वस्तु जैसे देखने और प्राप्त करने योग्य
पहले माया द्वारा कल्पित हुई, वह सब वैसे ही आज भी दिखाई देती है ओर पाई जाती हे ब्रह्मा के
संकल्प अनुसार ही ओर लोगों की भी यह शारीरिक है ओर यह मानसिक है ऐसी कल्पना नियत हे ।
उससे भिन्न अन्य की कल्पना नहीं हो सकती, यह भाव है