Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verses 52–53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, verses 52–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 52,53
संस्कृत श्लोक
सर्गे स्थितिं गते त्वन्या योदेति कल्पनापरा ।
सा व्योमानिलमाश्रित्य प्रविश्यौषधिपल्लवान् ॥ ५२ ॥
काचित्सुरत्वमायाति काचिदायाति यक्षताम् ।
उदेति प्रथमं सैषा ब्रह्मत्वं समवाश्नुते ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरा दल औषधि पल्लवो के विकारभूत सोमरस, धृत, दूध से सिद्ध होनेवाले कर्म का फल है,
अतः उनका परिणाम होने के कारण प्रथम दल की अपेक्षा स्थूल होने से उसे उपदेशमात्र से ब्रह्म प्राप्ति
होती है, यों विशेषता दिखलाते हैं।
प्रजापतियों की और औषधियों की सृष्टि होने पर जो देवानीकरूप दूसरी पहले की अपेक्षा न्यून
कल्पना उदित होती है, वह पहले चन्द्रमा की कलारूप से आकाश और वायु का अवलम्बन करके
ओषाधि पल्लवों में प्रवेश कर सोम, घृत और दूधरूप से अग्नि में हवन होने पर सूर्यमण्डल में अमृत के
आकार से परिणत हो प्रजापति आदि से उपभुक्त होती है । उनके उपभोग के अनन्तर उनके वीर्यरूप
से परिणत हुई मैथुन द्वारा कोई इन्द्र आदि सुरता, कोई कुबेर आदि यक्षयोनिता को प्राप्त होती है। वह
सात्त्विकि होने से मनुष्य आदि की अपेक्षा पहले प्रजापतियों के अनुग्रहपूर्ण उपदेश आदि से
ज्ञानैश्वर्यसम्पत्ति द्वारा अभ्युदित होती है, इसलिए पहले ही वह ब्रह्मत्व को प्राप्त होती है