Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
इत्थं गतास्थितिरियं किल रामभद्र सृष्टिः स्फुटप्रकटसंकटकर्मलब्धा ।
आविर्भवेद्विविधवेगविहारभारसंरम्भगर्भविधृता कलनापदे सा ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
क्रीडा-कोतुकों तथा क्रोध, लोभ से बढ़े हुए व्यवहारो से क्रमश: दृढ़ स्थिति को प्राप्त हुई तीन अनीकरूप
सृष्टि सर्गोन्मुख ब्रह्म मेँ इस प्रकार पूर्वोक्त संकल्पकल्पना से ही सत्ता को प्राप्त होकर आविर्भाव को
प्राप्त हुई हे