Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 42
33 verse-groups
- Verse 1यह उत्पन्न होकर प्रोढता को प्राप्त हुई है, इसने दोष के लिए ही अपने आकार का विस्तार किया ह…
- Verse 2अब उसके लिए जीव के अवतरणक्रम का वर्णन करने के लिए चालीसवें सर्ग मे "तासां सम्यकू प्रवक्ष्…
- Verse 3जिस भाँति सर्वव्यापक, निर्दोष, अनादि, अनन्त, भ्रम कलंकरहित, अमृत ब्रह्म जीवरूप हुआ, उसे भ…
- Verse 4स्पन्दनरहित उस ब्रह्म का जीवरूप चिदाभास चिद् ही है, जैसे सौम्य (निश्चल) सागर ही चलन से त…
- Verse 5शक्तियों की विचित्रता सत्त आदि गुणों की वृद्धि तथा हास के परस्पर मिश्रण के तारतम्य से होत…
- Verse 6यद्यपि ब्रह्म स्वतः कूटस्थ है, तथापि उसमें आध्यासिक चलन का अविरोध दिखलाते हैं । जैसे वायु…
- Verse 7स्पन्दशक्ति का स्पन्दरहित प्रकाशशक्ति से भी विरोध नहीं है, इसमें दृष्टान्त देते हैं। जैसे…
- Verse 8जैसे सागर शरद् ऋतु की धूप के सम्बन्ध से चमक रहे जल प्रदेश में ही चंचल सा प्रतीत होता हे,…
- Verse 9परमार्थतः अन्यरूप होते हुए भी कल्पित अन्यरूप से स्फुरणो में भी यही दृष्टान्त है, इस आशय स…
- Verse 10जैसे अतीन्द्रिय आकाश में मोतियों की माला कभी-कभी लहराती हुई-सी दिखाई देती है, वैसे ही चिन…
- Verse 11जैसे समुद्र में निर्मल तरंग समुद्र ही हे, वैसे ही चिद्रूपी महासागर में कुछ क्षुभित रूपवाल…
- Verse 12ऐन्द्रियक वितृशक्ति परमार्थ चिति ही है, उसमें उत्पत्ति का आरोप केवल औपाधिक है, इस आशय से…
- Verse 13इसलिए उसके कालिक परिच्छेद तथा उक्त थक्तिमत्ता आदि रूप भेदप्रतीति की उपपत्ति होती है, ऐसा…
- Verse 14अन्यान्य शक्तियो की प्रवृत्ति वितृशक्ति के उदय के अधीन ही है, स्वतन्त्ररूप से उनकी प्रवृत…
- Verse 15इस प्रकार अपने स्वभाव को जानकर यह अनादि, अनन्तपद में स्थित होती है । अविचारित होती हुई पू…
- Verse 16जभी उस परमसत्ता ने इस प्रकार के स्वरूप की भावना की, तभी तुरन्त नाम रूप भेद आदि जगत की सम्…
- Verse 17इस प्रकार चित् मे कल्पित सकल दृश्य का चिन्मात्रत्व ही परमार्थरूप है, यो फलित हुआ, ऐसा कह…
- Verse 18जैसे कटक- केयुरों से सुवर्ण का भेद विलक्षण है वैसे ही अंशकल्पना के अधीन सम्पूर्णं जगद्रूप…
- Verse 19जैसे दीपक से उत्पन्न हुए दीपको का देश, काल ओर कलामात्र से भेद है वैसे ही चित् का भी उपाध…
- Verse 20देश, काल ओर क्रिया की शक्ति से संदीपित हुआ चैतन्य संकल्प का अनुसरण करता हुआ कल्पना को प्र…
- Verse 21इसीलिए क्षेत्रोपाधिकल्पना के अधीन चैतन्य का क्षेत्रज्ञत्व प्रसिद्ध है, ऐसा कहते है । हे म…
- Verse 22शरीर क्षेत्र कहलाता है, उसको भली भाँति बाहर-भीतर सर्वतोभावेन वह जानता है, इसलिए वह क्षेत्…
- Verses 23–25वासनाओ की कल्पना करता हुआ वह कषेत्रज्ञ अहंकारता को प्राप्त होता है। निश्चय करनेवाला अतएव…
- Verse 26इस प्रकार संकल्पवासनारूपी रस्सी से परिवेष्टित और विविध दुःखों से व्याप्त जीव ही क्रम से ब…
- Verse 27जैसे फल पाकवश क्रमशः रूप, रस आदि गुणों के परिवर्तनसे ही अन्यरूपता को प्राप्त होता है, आकृ…
- Verses 28–29इस प्रकार क्षेत्र सिद्धि कह कर जीव का अहंकार आदि क्षेत्र में तादात्म्यसंगध्यासरूप बन्धक्र…
- Verses 30–31उक्त विषयो मे आसक्ति होने पर उन विषयों का पुनःपुनः स्मरण करता हुआ चित्तभाव को प्राप्त हुआ…
- Verses 32–33इस प्रकार राग, द्वेष आदि शक्ति सम्पन्न मन शाखा-प्रशाखारूप से अभिमान की वृद्धि होने के कार…
- Verses 34–35स्वयं संकल्पित शब्द आदि विषयरूप इन्धन से युक्त राग आदि रूप ज्वालाओं के मध्य में स्थित मन…
- Verses 36–38वही मनन आदि वृत्तियों के भेद से मन आदि शब्दों का भाजन होता है, अन्य नहीं, ऐसा कहते हैं। क…
- Verses 39–50यूथ से विड हुए मृग के समान शोक से अचेत हुए, विषयरूपी अग्नि में पतंगे के समान ज्वालाओं से…
- Verse 51हे श्रीरामचन्द्रजी, कामरूपी छोटी तलैया में वैल के समान खूब फँसे हुए तथा चिरकाल तक विषयभोग…
- Verse 52पूर्वोक्त तत्त्वज्ञान ओर उसके साधनो मेँ अनादर करनेवाले पुरुष की निन्दा द्वारा इस सर्ग का…