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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verses 36–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 36-38

संस्कृत श्लोक

क्वचिन्मनः क्वचिद्रुद्धिः क्वचिज्ज्ञानं क्वचित्क्रियाः । क्वचिदेतदहंकारः क्वचित्पुर्यष्टकं स्मृतम् ॥ ३६ ॥ क्वचित्प्रकृतिरित्युक्तं क्वचिन्मायेति कल्पितम् । क्वचिन्मलमितिप्रोक्तं क्वचित्कर्मेतिसंस्थितम् ॥ ३७ ॥ क्वचिद्बन्धमिति ख्यातं क्वचिच्चित्तमिति स्फुटम् । प्रोक्तं क्वचिदविद्येतिक्वचिदिच्छेति संस्थितम् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

वही मनन आदि वृत्तियों के भेद से मन आदि शब्दों का भाजन होता है, अन्य नहीं, ऐसा कहते हैं। कहीं पर वह मन कहा गया है, कहीं पर बुद्धि, कहीं पर ज्ञान तथा कहीं पर क्रिया कहा गया हे । कहीं पर अहंकार, कहीं पर पुर्यष्टक, कहीं पर प्रकृति तथा कहीं पर माया नाम से उसकी कल्पना हुई हे । कहीं पर वह मल कहा गया है, कहीं पर माया नाम से उसकी कल्पना हुई है । कहीं पर कर्मरूप से स्थित हैं, कहीं पर बन्धनाम से प्रसिद्ध हे ओर कहीं पर चित्त नाम से पुकारा गया हे । कहीं पर अविद्या नाम से और कहीं पर इच्छारूप से अवस्थित हे