Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
शुभाशुभप्रसरपराहताकृतौ ज्वलज्जरामरणविषादमूर्च्छिते ।
व्यथेह यस्य मनसि भो न जायते नराकृतिर्जगति स राम राक्षसः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त तत्त्वज्ञान ओर उसके साधनो मेँ अनादर करनेवाले पुरुष की निन्दा द्वारा इस सर्ग का
उपसंहार करते है ।
मन के काम्य शुभकर्म ओर निषिद्ध कर्मो के आधिक्य से मलिन स्वरूपवाले एवं खूब प्रज्वलित हो
रहे जरा, मृत्यु ओर विषादो से मूर्छित होने पर जिसको इस जगत में क्लेश नहीं होता वह मनुष्य
नराकृति में छिपा हुआ राक्षस है