Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्वस्वभावं विदित्वैवमनाद्यन्तपदे स्थिता ।
रूपं परिमितेवासौ भावयत्यविभाविता ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस
प्रकार अपने स्वभाव को जानकर यह अनादि, अनन्तपद में स्थित होती है । अविचारित होती हुई
पूर्वोक्त कल्पितरूप को भ्रमवश अपना स्वरूप जानकर 'मैं परिच्छिन्न हू, यों अपने स्वरूप की भावना
करती है